कुरुक्षेत्र युद्ध, भीष्म पितामह के पराक्रम और श्रीकृष्ण की लीला पर आधारित भावपूर्ण कविता
महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में भीष्म पितामह का पराक्रम अद्वितीय था। 18 दिनों तक चले इस महायुद्ध में पहले 10 दिनों तक पितामह ने कौरव सेना का नेतृत्व किया और अपने अद्भुत युद्ध कौशल से पांडव सेना को भारी क्षति पहुँचाई।
लेकिन जब माधव श्रीकृष्ण की इच्छा हुई, तब परिस्थितियाँ बदल गईं। अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके भीष्म पितामह पर बाण चलाए और अंततः वे बाणों की शैया पर लेट गए।
भीष्म पितामह बाणों की शैया पर – कविता
शंखनाद की ध्वनि गूंजी, महायुद्ध आरंभ हुआ।
कुछ ही क्षण में कुरुक्षेत्र की लाल मिट्टी का रंग हुआ।
दोनों पक्षों के सैनिक गाजर-मूली से कटते थे,
दोनों तरफ की सेना के दल पलक झपकते घटते थे।
पहले 10 दिन तक तो केवल पितामह का तांडव था,
जिसके कारण पांडव दल का हर एक योद्धा चिंतित था।
वहां की पांडव सेना गायब जिधर से भी वो निकल गए,
एक अकेले पितामह आधी सेना को निगल गए,
एक अकेले पितामह आधी सेना को निगल गए।
माधव ने अब क्रोध में आकर प्रण तोड़ने की ठानी,
मैं क्यों प्रण को याद रखूं जब सामने हो एक अभिमानी!
शस्त्र त्याग दो पितामह जो धर्मजीत में बाधित है,
वरना आज तुम्हारा यह वध मेरे हाथों निश्चित है।
सब विध्वंस मुझ से है, मैं ही हूं तुम्हारा काल रूप,
कहकर माधव ने दिखलाया उनको अपना विकराल रूप।
पाकर नारायण को समक्ष, पितामह ने शस्त्र त्याग दिया,
अर्जुन ने शिखंडी को करा आगे, बाणों से उनको भेद दिया।
भला हार भी कैसे वो जाए जिसको विश्वास कन्हैया पर,
पितामह को लिटा दिया लाकर बाणों की शैया पर।
भीष्म पितामह बाणों की शैया पर कैसे पहुँचे?
महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरव सेना के सेनापति थे। उन्होंने लगातार दस दिनों तक पांडव सेना का सामना किया। उनके युद्ध कौशल और पराक्रम के कारण पांडव पक्ष के योद्धाओं के लिए उन्हें रोकना अत्यंत कठिन था।
भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसलिए उनका जीवन सामान्य योद्धाओं की तरह किसी भी क्षण समाप्त नहीं किया जा सकता था। युद्ध के दसवें दिन उन्हें परास्त करने के लिए अर्जुन ने शिखंडी को अपने आगे रखा।
शिखंडी के सामने भीष्म ने अस्त्र नहीं उठाए। इसी अवसर का लाभ उठाकर अर्जुन ने उन पर अनेक बाण चलाए। बाणों से घायल होकर भीष्म धरती पर नहीं गिरे, बल्कि बाणों ने ही उनके शरीर को सहारा दिया।
इसी कारण महाभारत का यह प्रसिद्ध प्रसंग “बाणों की शैया” के नाम से जाना जाता है।
श्रीकृष्ण और भीष्म पितामह का प्रसंग
कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान एक समय ऐसा आया जब श्रीकृष्ण अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपना प्रण तोड़ने तक का संकल्प कर लिया था। यह प्रसंग श्रीकृष्ण और अर्जुन के संबंध तथा धर्म की स्थापना में उनकी भूमिका को दर्शाता है।
भीष्म पितामह भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। उनके लिए श्रीकृष्ण केवल युद्धभूमि में उपस्थित एक सारथी नहीं, बल्कि स्वयं भगवान के स्वरूप थे।
पितामह को लिटा दिया लाकर बाणों की शैया पर।”
कविता का भाव
इस कविता में कुरुक्षेत्र के युद्ध, भीष्म पितामह के अद्भुत पराक्रम और श्रीकृष्ण की लीला को भावपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत किया गया है।
कविता की अंतिम पंक्तियाँ विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति भीष्म पितामह के विश्वास को दर्शाती हैं। एक महान योद्धा होने के बावजूद भीष्म जानते थे कि अंततः भगवान की इच्छा ही सर्वोपरि है।
भीष्म पितामह की बाणों की शैया
भीष्म पितामह का जीवन त्याग, प्रतिज्ञा, वीरता और धर्म के अनेक पहलुओं को अपने भीतर समेटे हुए है। कुरुक्षेत्र में उनके दस दिनों का युद्ध महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक माना जाता है।
बाणों की शैया पर लेटे भीष्म पितामह का प्रसंग आज भी महाभारत की महान कथाओं में विशेष स्थान रखता है। यह प्रसंग हमें यह भाव देता है कि कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न हो, ईश्वर की इच्छा के सामने अंततः वही सर्वोपरि होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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