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!! कर्मगति..विचित्र किंतु सत्य !!

 !! कर्मगति..विचित्र किंतु सत्य !!

          ….जीवन में सब कुछ एक निवेश की तरह ही है। प्रेम,समय, साथ, खुशी, सम्मान और अपमान, जितना - जितना हम दूसरों को देते जायेंगे, समय आने पर एक दिन हमें  अवश्य वापस मिलने वाला है ।*


कभी दुख के क्षणों में अपने को अलग - थलग पाएं तो एक बार आत्मनिरीक्षण अवश्य कर लें कि क्या जब मेरे अपनों को अथवा समाज को मेरी जरूरत थी तो मैं उन्हें अपना समय दे पाया था..? क्या किसी के दुख में मैं कभी सहभागी बन पाया था..? हमें अपने प्रति दूसरों के उदासीन व्यवहार का कारण स्वयं स्पष्ट हो जायेगा।


कभी जीवन में अकेलापन महसूस होने लगे और आपको अपने आसपास कोई दिखाई न दें जिससे मन की दो चार बात करके मन को हल्का किया जा सके तो हमें एक बार पुनः आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। क्या हमारी उपस्थिति कभी किसी के अकेलेपन को दूर करने का कारण बन पाई थी अथवा नहीं...? हमें अपने एकाकी जीवन का कारण स्वयं समझ आ जायेगा।


श्रीमदभागवत जी की कथा में हम लोग गाते हैं कि, देवी द्रौपदी ने वासुदेव श्रीकृष्ण को एक बार एक छोटे से चीर का दान किया था और समय आने व आवश्यकता पड़ने पर विधि द्वारा वही चीर देवी द्रौपदी को साड़ियों के भंडार के रूप में लौटाया गया।

श्रीमदभागवत जी की कथा


*अच्छा - बुरा, मान - अपमान, समय - साथ, और सुख - दुख जो कुछ भी आपके द्वारा बाँटा जायेगा, देर से सही मगर एक दिन हमें प्रति फल मिलेगा जरूर,ये तय है ।

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